प्रा. विकास कुंडलिक विधाते द्वारा लिखित यह संपादकीय ग्रंथ अध्ययन और संशोधन की दृष्टि से बहुत ही महत्वपुर्ण ग्रंथ है। अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी उनके जमाने के और आज के युग के औरत आनेवाले युग के सबसे बडे परिवर्तनवादी, क्रांतिकारी विचारक तथा बहुजनो के नेता है।
प्रा. विकास विधाते जी के इस ‘युगपुरूष डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. बाबासाहेब जी आनेवाले पिढी के लिए एक क्रांतिकारी विचारक ही नहीं तो लोगो के बीच जाकर उनकी समस्याएँ और जरूरते देखकर ध्येयानुकूल उन्हे मोडने के लिए कार्य करनेवाले एक महान नेता भी थे।
वैसे तो अपने देश मे महाराष्ट्र एक क्रांतिकारीयों की भूमि रही है। महाराष्ट्र में तो लंबे अरसे से संशोधन और संशोधक के रूप में विचारवंतो और कार्यकर्ता की कोई कमी नही है। प्रस्तुत ग्रंथ में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी के आलेख को पढने के बाद दर्शकों, वाचको के मन मे एक पढ़ने की ही भावना निर्माण होती है। ऐसा मेरा यकिनन मानना है। उसी के साथ-साथ गर्व की यह भी एक बात है कि प्रस्तुत ग्रंथ में प्रा. विधाते जी ने महाराष्ट्र के विचारवंत लेखकों के साथ साथ पुरे भारतवर्ष के लेखको चिंतको से आलेख प्राप्त किए है। इतना ही नही विदेश से भी इस ग्रंथ में आलेख भेज दिए है। विशेष रूप से हिंदी साहित्य के प्रसिध्द विश्लेषक, समिक्षक, चिंतक, लेखक कवि, प्रा. सुशिला टाकभोरे, जयप्रकाश कर्दम, डॉ.पी. चिलवंत, डॉ. चंद्रकांत, संपादक अशोकदास दलित दस्तक आदी देश के जाने माने लेखकों के आलेख पढकर दर्शक डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर के कार्यों से जान पडते नजर आते है।
प्रा. विकास विधाते जी के ग्रंथ को पढने के बाद स्पष्ट रूप से डॉ. बाबासाहेब जी के राष्ट्रीय कार्य, संविधान का कार्य, डॉ. बाबासाहब एक महान समाजशास्त्री, अर्थशास्त्रज्ञ, इतिहासकार, संपादक, लेखक, बोधिसत्व, महामानव क्रांतिसूर्य, राजनीतीज्ञ, मानसशास्त्रज्ञ थे इस बात का पता चलता है। भले ही उस युग में प्रस्थापित आंदोलनकर्ताद्वारा डॉ. बाबासाहब जी को संविधान सभा में जाने के लिए विरोध किया गया। इतना ही नही “डॉ. बाबासाहब ने कितने प्रतिकुल परिस्थिती में अपना काँरवा बहुजनोके खातिर चलाया आगे चलकर यह ग्रंथ पढकर यह भी पता • चलता है कि उन्होंने प. बंगाल से जसना तथा खुलना मतदार सघ से चुनाव लढा और वहाँ के दलित नमोशुद्र, चमार और मुस्लमान के बल पर चुनाव जितकर वह संविधान सभा में पहुंचे।
उनका राष्ट्रीय कार्य दलितो, आदिवासियों किसान, मजदूर, महिला आदी के बारे में विचार पाकर में तो सोचता ही रह गया। ‘मुझे धम्म से अधिक प्यार है”? यह आलेख पढकर पता चला कि डॉ. बाबासाहब जातियता से तंग आकर धर्म बदलने की गर्जना करते है। फिर भी किसी के मुंह से आह तक नही निकलती। उस समय दुनिया के नामी गिरामी धर्म के प्रमुख उन्हें अपने-अपने धर्म में बुलाने के लिए जाल बिछाते है। फिर भी डॉ. बाबासाहब अपने विचारों से टस से मस न होकर अपने ही मिट्टी का यहाँ के बहुजनो के हित का धर्म “बौध्द धर्म’’अपनाते है। मुझे लगता है यही उनकी रक्तविहिन क्रांती थी । इतना ही नही डॉ.बाबासाहब ने अपने जीवन में तीन गुरूओं को माना उससे पता चलता है कि वह एक समतावाले नेता थे। अगर वह चाहते तो अपने ही जाती में जन्मे पुरूष, या साधु को अपना गुरू मानते पर उन्होंने ऐसा कदापि नही किया। जिन महापुरूषो ने अपने-अपने युग में समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय लाने का प्रयास किया उन्हीं महापुरूषो को ही (बुध्द, कबीर, और फुले) उन्होंने अपना गुरू मान लिया। नही तो आज अपने देश में अपने ही जाति का नेतृत्व मानने के लिए एक दोड सी लगी हुई है। यह बात स्पष्ट है, कि बुध्द, फुले, कबीर की विचारधारा, डॉ.बाबासाहब के वजह से ही सारी दुनिया को मालुम हो गई।
Keywords : Vikas Kundlik ǀ Edited Book ǀ Sanwad Prakashan Pvt. Ltd. ǀ Sampadit Pustake ǀ Hindi Books ǀ Hindi Articles












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